राजनीति में प्रतीकों का महत्व सार्थक व सकारात्मक होता है
ऐसा नहीं है कि पहचान की राजनीति व्यर्थ है हमारा मतलब प्रतीकों की राजनीति प्रतीक ऐसे कोई स्मारक कोई इवेंट कोई इन्नोवेशन जो इतिहास में बरकरार रहे नामजद रजिस्ट्रेशन किसी इवेंट का यह प्रतीकों की राजनीति से जुड़ा हुआ एक कदम है प्रतीक कभी-कभी बहुत बड़े बदलाव को पैदा करते हैं राजनीति में प्रतीकों का महत्व सार्थक व सकारात्मक होता है उदाहरण के लिए महात्मा गांधी की दांडी यात्रा में नमक बनानाइवेंट प्रतीकात्मक काम था उसने भारत की आजादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई आज वर्तमान में भारत में हिंदुत्व की राजनीति या हिंदू पहचान की राजनीति हमें ऐसी रप्टली राह पर ले जा रही है जिस राह पर 80 के दशक में पाकिस्तान गया था और उसके बाद वहां की आर्थिक विकास दर फिसलता चला गया और आज वह दिवालिया हालात में है हिंदू धर्म और संस्कृति ना कभी खतरे में थे और ना है अगर मध्य काल में मुगल शासक और बाद में ईसाइयों के आने के बाद भी हिंदू संस्कृति फलती फूलती वही तो वर्तमान काल में उसे क्या खतरा हो सकता है हिंदुत्व हिंदुत्व को असुरक्षा का डर तथा पहचान की राजनीति अगर आकर्षित करने लगे तो इससे यह समझा जा सकता है कि हिंदुत्व राजनीति और हिंदू समाज दोनों में कुछ बड़ी खोट है अगर समाज के अल्पसंख्यक या दबे कुचले समूह पहचान की राजनीति पर जोर दें तो यह समझ में आता है क्योंकि उनकी सुरक्षा और पहचान की राजनीति की भावना को समझा जा सकता है हिंदुत्व की विचारधारा और हिंदूवादी संगठन के लोग आजादी से पहले या ठीक बाद की कठिन परिस्थितियों में सरदार पटेल के साथ खड़े नहीं हुए थे अब 21वीं सदी के दौर मैं सरदार पटेल की आसमान से ऊंची मूर्ति बना दें उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है आजादी से पहले वंदे मातरम का नारा लगाने का अर्थ देश भक्ति का प्रतीक था परंतु अब 21वीं सदी में आजाद भारत में वंदे मातरम कहने का महत्व वह नहीं हो सकता है जो कि आजादी से पहले था इसी प्रकार से अगर आजादी से पहले तिरंगा झंडा लेकर के फहराते हुए बंदे मातरम कहते सड़क पर निकलना एक साहस पूर्ण कार्य था जोकि अंग्रेजो के खिलाफ प्रतिरोध विरोध का प्रतीक था लेकिन यहां अगर कोई क्रिकेटर मैच जीतने के बाद स्टेडियम में तिरंगा लहराने वाला उतना बड़ा देशभक्त नहीं हो जाता है जितना की आजादी से पहले सड़कों पर तिरंगा लहराने वाला होता था हम कह सकते हैं कि प्रतीकों महत्व उसके समय और स्थान के संदर्भ में भी होता है ऐसा नहीं है कि प्रतीकों की या पहचान की राजनीति व्यर्थ बेकार होती है मैं यह कभी नहीं कहता लेकिन प्रतीकों के ऊपर समय स्थिति स्थान और देश काल का बहुत महत्व है 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर इवेंट एक ऐसा ही प्रतीक बन के सामने आ रहा है


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